राजस्थान का इतिहास- राजस्थान का संपूर्ण इतिहास, history of Rajasthan in Hindi

राजस्थान का इतिहास पूर्व पाषाण काल से शुरू होता है | प्राचीन समय में राजस्थान में आदिवासी कबीले शासन करते थे | 2500 ईसा पूर्व राजस्थान में सिंधु घाटी सभ्यता का उद्गम हुआ | विश्व के सबसे प्राचीनतम साहित्य में प्रमुख स्थान रखने वाले आर्यों के धर्म ग्रंथ का ऋग्वेद में मत्स्य जनपद का उल्लेख मिलता है, जो प्राचीन राजस्थान का हिस्सा था |

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महाभारत काल में राजस्थान का इतिहास

इस काल में भी राजस्थान मत्स्य नरेश विराट का उल्लेख आता है | इससे जाहिर होता कि महाभारत काल के पूर्व से ही राजस्थान बसा हुआ है | मत्स्य वर्तमान राजस्थान में था, जहां पांडवों ने महाभारत काल में अज्ञातवास बिताया था |

महाभारत काल में राजस्थान में जयपुर से 80 किलोमीटर दूर बैराट मोजुद हैं (महाभारत काल में विराटनगर कहना था |) जो राजस्थान के प्राचीनतम सामा्ज्य मे से एक है | राजस्थान के प्राचीनतम का पता समा्ट अशोक के दो शिलालेख से चलता है |

महाभारत काल में मथुरा राजधानी के शूरसेन जनपद के प्रमुख अंश, वर्तमान समय की करौली, धौलपुर, भरतपुर इत्यादि हुआ करते थे |

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राजस्थान का इतिहास

प्राचीन काल में राजस्थान का इतिहास

प्राचीन राजस्थान में बनास नदी व अरावली की पहाड़ियों पर मनुष्य निवास करते थे | पत्थरों से बने औजार की सहायता से भोजन की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह पर घूमते रहते थे | पत्थर से बने औजार के नमूने बैराठ और भानगढ़ के आसपास पुरातत्व विभाग की खुदाई में मिले हैं |

अतिप्राचीन काल में राजस्थान आज की तरह बीहड़ मरुस्थल नहीं था | अति प्राचीन काल में उत्तर-पश्चिम राजस्थान में सरस्वती और दृषद्वती जैसी विशाल नदिया बहा करती थी |

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कालीबंगा के आसपास की गई खुदाई में विकसित नगर सभ्यता का पता चला है | यहां पर हड़प्पा सभ्यता जैसी संस्कृति फली-फुली है |

उस समय राजस्थान में इसा पुर्व में चौथी सदी में राज्य अनेक छोटे-छोटे गणराज्य में बटा हुआ था, इन राज्यों में मालवा और शिवि दो बड़े शक्तिशाली पांन्त थे, जिन्होंने सिकंदर को आगे बढ़ने से रोका था |

शिलालेखों से इस बात का पता चलता है कि तीसरी सदी में उत्तर राजस्थान काफी समृद्ध इलाका था | वर्तमान समय के भरतपुर के नाव्ह नामक स्थान पर की हुई खुदाई से मौर्य काल की मूर्तियां, बर्तन अनेक सारे अवशेष मिले हैं |

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प्राचीनतम राजस्थान में छठी शताब्दी में हूणों ने मालवा व आसपास के छात्रों में लूटपाट मचाई और यहां पर अपना अधिकार जमा लिया, लेकिन गुप्त वंश के शासक यशोधर्मन ने हूणों को परास्त करके, फिर से अपना आधिपत्य स्थापित किया |

मध्यकाल में राजस्थान का इतिहास

राजस्थान में मध्यकाल की शुरुआत के साथ की शुरू हुआ राजपूती युग का आरम्भ | राजपूतों ने अलग-अलग प्रांतों को मिला कर अपने वंश और क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषाओं के आधार पर स्थानो का नामकरण करके अपना राज्य स्थापित कर दिया |

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मध्यकाल राजस्थान में राजपूतों के उदय के समय- डूंगरपुर, उदयपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, बीकानेर, जोधपुर, सिरोही, कोटा, बूंदी, जयपुर, अलवर, करौली, झालावाड़ व जैसलमेर इत्यादि रियासतें प्रमुख थी | इन सभी रियासतों को मिलाकर राजस्थान “राजपूताना” बना था |

मुगल काल में राजस्थान का इतिहास

इस काल में राजस्थान का इतिहास राजपूत राजाओं ने अपनी तलवार से लिखा | इस काल में पूरे राजस्थान पर राजपूत शासकों का अधिकार था, इसीलिए उस समय राजस्थान को “राजपूताना” कहा जाता था |

मुगल काल के पूर्व क्षत्रिय राजपूत राजा “पृथ्वीराज चौहान” ने मोहम्मद गौरी को 16 बार हराकर वीर योद्धा कहलाए | पृथ्वीराज चौहान भारत की राजधानी “दिल्ली” की गद्दी पर विराजमान अंतिम हिंदू सम्राट थे |

मुगलकालीन राजस्थान में महाराणा प्रताप, महाराणा सांगा, महाराणा कुंभा, महाराणा सूरजमल, महाराणा जवाहर सिंह, वीर दुर्गादास राठौड़ जैसे अनेकों क्षत्रिय राजपूत योद्धाओं ने अपने अदम्य साहस का परिचय देते हुए इतिहास लिखा |

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इस काल में पन्नाधाय जैसे बलिदानी माता और मीरा जैसी भक्तिनी देखने को मिली | भक्तीनीं कर्मा बाई ने स्वयं अपने हाथों से “भगवान जगन्नाथ” को खिचड़ा खिलाया था | मुगल कालीना राजस्थान में धूमाड़ी, मेवाती, ब्रजभाषा, मारवाड़ी जैसी अनेक प्रकार की क्षेत्रीय भाषाएं. अलग-अलग क्षेत्रो में बोली जाती थी |

ब्रिटिश काल में राजस्थान का इतिहास

राजस्थान में ब्रिटिश काल की शुरुआत के साथ ही शुरू हुआ राज्य का नामकरण | राजस्थान को राजपूताना से “राजस्थान” पुकारा जाने लगा, क्योंकि अंग्रेजों ने राजस्थान का अर्थ “राजाओं का स्थान” अर्थात “राजपूत राजाओं से रक्षित भूमी” को राजस्थान कहा |

ब्रिटिश काल में भी अंग्रेजों से लोहा लेते हुए अनेकों क्षत्रिय राजपूत योध्दाओ ने वीरगति प्राप्त की, व हजारों बार राजपूतों ने अंग्रेजों के सामने अपने अदम्य साहस का परिचय देते हुए, अंग्रेजों को घुटने टेकने पर मजबूर किया |

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राजस्थान का एकीकरण

अंग्रेजों के देश छोडतेे ही शुरू हुआ आजाद भारत का नया राजस्थान, यहां पर प्राचीन काल से राजपूत राजाओं का शासन था. इसलिए सभी देशी रियासतें अलग-अलग भागों में बटीं हुई थी | कोई भी रियासत स्वतंत्र भारत का हिस्सा नहीं बनना चाहती थी, क्योंकि सैकड़ों वर्षो से राजपूत राजा शासन करते आ रहे थे और वे भली-भांति राज्य शासन करना जानते थे |

आजाद भारत के 1 वर्ष बाद 1948 को शुरू हुआ राजस्थान एकीकरण का महा अभियान और इसका मुख्य उद्देश्य था एक भारत का निर्माण करना | लेकिन उसके लिए जरूरी था, कि सबसे पहले एक राजस्थान का निर्माण हो | क्योंकि संपूर्ण राज्य अलग-अलग रियासतों में बटां हुआ था व सभी रियासतें अपने आप को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित करना चाहती थी |

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देश के तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल और उनके सचिव वी. पी. मैनन की सूझबूझ से राजस्थान के सभी देसी रजवाड़ों ने राजस्थान एकीकरण प्रस्ताव को सम् 1956 में मंजूर किया | तो बन गया एक स्वतंत्र राजस्थान, जो क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का सबसे बड़ा राज्य है व राजस्थान से 21 राष्ट्रीय राजमार्ग गुजरते हैं |

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