राजस्थान के प्रमुख संत कौन-कौन हैं? Rajasthan Ke Pramukh Sant

राजस्थान के प्रमुख संत– राजस्थान की पहचान अपनी संस्कृति, परंपरा, रीति-रिवाज, व्रत-त्योहार, रंग-बिरंगे वस्त्र, सांस्कृतिक और धार्मिक कार्यक्रम, देवी-देवताओं का मान सम्मान, लोक देवताओं का आदर, संत एवं महात्माओं का सम्मान और प्राचीन दुर्ग, महल, किले, हवेलियां, गढ़, अभयारण्य एवं राष्ट्रीय उद्यान है।

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राजस्थान को ‘राजपूतों का देश‘ अर्थात “राजपूताना” भी कहा जाता है और अंग्रेजों के शासन काल में राजस्थान को राजपूताना नाम से जाना जाता था। आज के समय में राजस्थान अपने आप में एक विश्वविख्यात राज्य हैं।

राजस्थान के प्रमुख संत कौन-कौन हैं? Rajasthan Ke Pramukh Sant

राजस्थान में जीव दया और धर्म का पालन सदियों से चला आ रहा है। राजस्थान में प्राचीन काल से अब तक लाखों-करोड़ों संत महात्मा हुए हैं। राजस्थान का लगभग 70% से अधिक लोग शाकाहारी है। इससे भारत में राजस्थान सबसे शाकाहारी राज्य बनता है। राजस्थान में अनेक सारे समुदाय, संप्रदाय, साधु, संत, लोक देवता, जीव रक्षक और धार्मिक युद्धा हुए हैं।

राजस्थान के प्रमुख संत कौन-कौन हैं?
राजस्थान के प्रमुख संत कौन-कौन हैं?

आज के इस आर्टिकल में हम राजस्थान के प्रमुख संत एवं राजस्थान के प्रसिद्ध संत के बारे में पूरी जानकारी विस्तार से बताएंगे। राजस्थान के प्रमुख संत कौन-कौनसे हैं, राजस्थान के प्रमुख संत के बारे में, राजस्थान के प्रसिद्ध संत कौन-कौनसे हैं, राजस्थान के लोकप्रिय संत कौन-कौनसे हैं, राजस्थान के प्रमुख व प्रसिद्ध संत के बारे में पूरी जानकारी-

पीपाजी जी

संत पीपाजी एक हिंदू राजपूत थे, जिन्होंने रहस्यवादी कवि बनने के लिए अपना राज्य शासन छोड़ दिया था। संत पीपा जी का जन्म मालवा में 1425 को हुआ था, इनके पिता का नाम कटावाराम व गुरु का नाम रामानंद जी था। दर्जी समुदाय संत पीपाजी को अपना आराध्य देव मानता है।

संत पीपाजी को राजस्थान में अनेक से अलग-अलग नामों से पुकारते हैं। जैसे- सरदार पीपा, भगत पीपा, संत पीपाजी, पीपा आनंद, आचार्य राजा, पीपा जी, प्रताप सिंह, राव पिपा इत्यादि। संत पीपा जी ने अपने शासनकाल के दौरान दिल्ली के शासक फिरोज़ शाह तुगलक को युद्ध में हराया था।

टोंक में संत पीपा जी की गुफा स्थित है, जहां पर उन्होंने अंतिम समय भजन करते हुए बिताया था। संत पीपा जी की 20 रानियां थी। बाड़मेर के समदड़ी गांव में पीपा जी का मंदिर बना हुआ है। राजस्थान के इतिहास में संत पीपाजी को 15 वी शताब्दी के उत्तर भारत के प्रमुख भक्ति आंदोलन के शुरुआती व प्रभावशाली संतो में से एक माने जाते है।

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धन्ना जी

धन्ना जी का जन्म 1415 ईस्वी में टोंक में हुआ था। यह भारत के हिंदू तालीवाल जाट परिवार में पैदा हुए थे। टोंक में धन्ना जी की स्मृति में मेला लगता है। यह निर्गुण भक्ति के उपासक थे। धन्नाजी एक राष्ट्रवादी कवि और वैष्णव भत्ती के प्रचार थे।

संत रज्जब जी

संत रज्जब जी का जन्म सांगानेर जयपुर में 16 शताब्दी के दौरान हुआ था। संत रज्जब जी राम-रहीम और कैसव-करीम की एकता के गायन में निपुण भक्ति करते थे, वे एक निर्गुण संत थे, जिनकी मृत्यु जयपुर के संगानेर में हुई थी।

लालदास जी

लाल दास जी का जन्म 1540 ईस्वी में मेवात प्रदेश में हुआ था। लाल दास जी की समाधि भरतपुर में बनी हुई है। लाल दास जी ने अपने जीवन में हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल दिया था, इनकी मृत्यु बीकानेर के नंगला गांव में हुई थी।

आचार्य परशुराम

आचार्य परशुराम का जन्म सीकर जिले में 16वीं शताब्दी के दौरान हुआ था। आचार्य परशुराम ने हरि व्यास देवाचार्य जी से शिक्षा प्राप्त की थी, उसके बाद उन्होंने मथुरा में तपस्या की थी। आचार्य परशुराम जी 36 व निंबार्काचार्य थे।

संत सुन्दरदास जी

संत सुंदर दास जी का जन्म राजस्थान के दौसा जिले में वैश्य परिवार में हुआ था, उनके पिता का नाम परमानंद और माता का नाम सती था। सुंदर दास जी अपनी बाल्यावस्था में बाल कवि, बाल योगी एवं बाल ब्रह्मचारी बने थे। उन्होंने दादू धर्मों में नागा साधु का रूप धारण किया था। संत सुंदरदास जी एक महान एवं धार्मिक संत थे, जो समाज सुधारक का काम करते थे।

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माव जी

मावजी का जन्म डूंगरपुर के बांगड़ प्रदेश में हुआ था। संत मावजी निष्कलंक संप्रदाय के प्रवर्तक हैं। संत मावजी को श्री कृष्ण के कलंकी अवतार के रूप में पूजा जाता जाता है। संत माव जी की वाणी को ‘चोपड़ा’ कहते हैं। संत मावजी बांगड़ क्षेत्र के एक महान संत थे, इनकी माता का नाम केसर बाई था।

संत चरणदास जी

चरण दास जी का जन्म अलवर जिले में सन 1703 ईस्वी में हुआ था। चरणदास जी की चरण दास जी की मृत्यु 1782 ईस्वी में हुई थी। सरदार जी ने श्रीमद् भागवत गीता को आधार धर्म ग्रंथ माना था। संत चरणदास जी एक प्रमुख हिंदू धार्मिक शिक्षक थे, जो दिल्ली में शिक्षा देते थे।

रामचरण जी

रामस्नेही संप्रदाय के संस्थापक रामचरण जी का जन्म सन 1718 ईस्वी में जयपुर में हुआ था। रामचरण जी के पिता का नाम बख़तराम व माता का नाम देऊजी था। रामचरण जी निर्गुण भक्ति के संत थे, जिनके गुरु कृपाराम जी महाराज थे।

भक्ति कवि दुर्लभ

भक्ति कवि दुर्लभ का जन्म भानगढ़ सत्र में 1753 ईस्वी में हुआ था। राजस्थान में भक्ति कवि दुर्लभ को राजस्थान का नरसिंह भी कहा जाता है, उन्होंने अपने जीवन काल में कृष्ण भक्ति के उपदेश दिए थे।

हरिराम दास जी

संत हरिदास जी रामस्नेही पंथ की स्थापना की थी।
हरिदास जी का जन्म और मृत्यु बीकानेर में ही हुआ था। हरिदास जी ने रामस्नेही संप्रदाय की शाखा स्थली की स्थापना की थी।

संत हरिदास जी का जन्म सांखला राजपूत परिवार में हुआ था। नागौर की डीडवाना तहसील में हरिदास जी का समाधि स्थल बना हुआ है, ऐसी जगह पर उन्होंने समाधि ग्रहण की थी।

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संत नवलदास जी

नवलदास जी का जन्म नागौर जिले में हुआ था, यह नवल संप्रदाय के प्रवर्तक थे।

संत रामदास जी

संत रामदास जी का जन्म जोधपुर जिले में हुआ था। हरिराम दास जी से दीक्षा ग्रहण की थी, जो रामस्नेही संप्रदाय के थे। संत रामदास जी की मृत्यु खेपाड़ा में हुई थी।

हरिदास निरंजनी

हरिदास निरंजनी का नाम भारतीय संत कवि में शामिल है। इन्होंने निरंजनी संप्रदाय की स्थापना की थी। उनका जन्म राजस्थान के नागौर में हुआ था। हरिदास जी को राजस्थान में कलयुग का वाल्मीकि भी कहा जाता है।

जांभोजी

संत जांभोजी का जन्म नागौर जिले के पिपासर गांव में हुआ था। जांभोजी के पिता का नाम लोहटजी व माता का नाम हंसा बाई था। संत जांभोजी के गुरु का नाम गोरखनाथ था। संत जांभोजी ने राजस्थान में विश्नोई संप्रदाय की स्थापना की थी।

मीराबाई जी

राजस्थान की भक्तिनी मीराबाई का जन्म मेड़ता में हुआ था। मीराबाई के पिता का नाम रतन सिंह राठौड़ व उनकी माता का नाम खुशबू कुंवर था। मीराबाई के पति का नाम भोजराज था, जो राणा सांगा का पुत्र था।

राजस्थान के प्रमुख संत कौन-कौन हैं?
राजस्थान के प्रमुख संत कौन-कौन हैं?

महात्मा गांधी ने मीराबाई को भारत की प्रथम सत्याग्रही महिला कहा था। भक्ति मीराबाई के गुरु का नाम संत रैदास था। मीराबाई अपना शरीर के साथ गुजरात के रणछोड़ में मूर्ति में विलीन हो गई थी।

गवरी बाई

गवरी देवी को बांगड क्षेत्र में मीरा के नाम से जानते हैं। गवरी देवी अनेक सारे अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम में अपनी गायकी के भक्तिमय स्वर सुना चुकी है। गवरी बाई का जन्म जोधपुर में 1920 में हुआ था।

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अंतिम शब्द

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